Dhanvantari Idol in Kashi : धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की 300 साल पुरानी प्रतिमा के होंगे दर्शन, काशी में पांच पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा

Dhanvantari Idol in Kashi : धनतेरस पर वाराणसी के सुड़िया बुलानाला स्थित धन्वंतरि भवन में भगवान धन्वंतरि की 300 साल से अधिक पुरानी रत्नजड़ित अष्टधातु प्रतिमा के दर्शन होंगे। पांच पीढ़ियों से परिवार निभा रहा है विशेष पूजन और श्रृंगार की परंपरा।

Dhanvantari Idol in Kashi : धनतेरस पर होंगे भगवान धन्वंतरि की 300 साल पुरानी प्रतिमा के दर्शन, पांच पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा

Dhanvantari Idol in Kashi : वाराणसी। धनतेरस के पावन अवसर पर धर्म और आयुर्वेद की नगरी काशी में आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि की जयंती पर विशेष आयोजन किया जाएगा। सुड़िया बुलानाला स्थित धन्वंतरि भवन में विराजमान भगवान धन्वंतरि की 300 वर्ष से अधिक प्राचीन दुर्लभ अष्टधातु की प्रतिमा श्रद्धालुओं के सार्वजनिक दर्शन के लिए रखी जाएगी। रजत सिंहासन पर विराजमान करीब ढाई फीट ऊंची, 25 किलोग्राम वजनी और रत्नजड़ित इस प्रतिमा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की उम्मीद है।

Dhanvantari Idol in Kashi : कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को मनाई जाने वाली धन्वंतरि जयंती के मद्देनजर गुरुवार को ही भगवान के विग्रह का विशेष श्रृंगार किया गया। इस दौरान औषधीय पौधों से भगवान का अलौकिक श्रृंगार किया गया है। शुक्रवार को धनतेरस के दिन तिथि विशेष पर विधि-विधान से पूजन-अर्चन होगा। इसके बाद श्रद्धालु भगवान धन्वंतरि की दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन कर आरोग्य, सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करेंगे।

Dhanvantari Idol in Kashi :चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक धारण किए हैं भगवान

धन्वंतरि भवन में स्थापित भगवान धन्वंतरि की अष्टधातु की प्रतिमा अपने अनूठे स्वरूप और ऐतिहासिक महत्व के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र है। प्रतिमा में भगवान चार भुजाओं में विराजमान हैं। उनके एक हाथ में अमृत कलश, दूसरे में शंख, तीसरे में चक्र और चौथे हाथ में जोंक धारण की हुई है। आयुर्वेद में जोंक का विशेष चिकित्सकीय महत्व माना जाता है।

Dhanvantari Idol in Kashi :प्रतिमा के दोनों ओर सेविकाएं चंवर डुलाती हुई दिखाई देती हैं, जो इस दिव्य स्वरूप की शोभा को और बढ़ाती हैं। रत्नजड़ित प्रतिमा करीब ढाई फीट ऊंची और लगभग 25 किलोग्राम वजनी है। इसे चांदी के सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया गया है। 300 वर्ष से अधिक पुरानी इस दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन सामान्य दिनों में नहीं, बल्कि विशेष रूप से धन्वंतरि जयंती के अवसर पर श्रद्धालुओं को कराए जाते हैं।

Dhanvantari Idol in Kashi :पंडित बाबूनंदन ने करीब 300 साल पहले शुरू की थी परंपरा

धन्वंतरि भवन में भगवान धन्वंतरि की पूजा और जयंती मनाने की परंपरा करीब तीन शताब्दी पुरानी है। बताया जाता है कि स्वर्गीय राजवैद्य शिवकुमार शास्त्री के बाबा पंडित बाबूनंदन ने लगभग 300 वर्ष पहले भगवान धन्वंतरि की जयंती मनाने की शुरुआत की थी। समय के साथ यह आयोजन एक पारिवारिक परंपरा के रूप में स्थापित हो गया। खास बात यह है कि पांच पीढ़ियों से परिवार के सदस्य इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। बताया जाता है कि धन्वंतरि जयंती मनाने की यह परंपरा धीरे-धीरे अन्य स्थानों तक भी पहुंची। काशी में शुरू हुई इस धार्मिक परंपरा ने भगवान धन्वंतरि की आराधना और आयुर्वेद के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

Dhanvantari Idol in Kashi : वर्तमान पीढ़ी भी पूरे विधि-विधान से कर रही परंपरा का निर्वहन

वर्तमान में वैद्यराज शिवकुमार शास्त्री के पुत्र रामकुमार शास्त्री, नंद कुमार शास्त्री और समीर कुमार शास्त्री इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। धन्वंतरि जयंती पर भगवान का विशेष पूजन, औषधीय पौधों से श्रृंगार और प्रतिमा के सार्वजनिक दर्शन की व्यवस्था परिवार की देखरेख में की जाती है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का प्रवर्तक और आरोग्य का देवता माना जाता है। ऐसे में काशी के सुड़िया बुलानाला स्थित धन्वंतरि भवन में 300 वर्ष से अधिक पुरानी इस दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था और आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। पांच पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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