Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : दालमंडी की महफिलें उजड़ीं, लोक गायिकाओं की इज्जत पर सवाल

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : बनारस लिट फेस्ट 2026 में लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने दालमंडी की उजड़ती महफिलों, काशी की लोक गायिकाओं के संघर्ष और संगीत परंपरा की उपेक्षा पर गहरी चिंता जताई।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : बनारस लिट फेस्ट 2026 में छलका लोक गायिका मालिनी अवस्थी का दर्द

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : काशी की परंपरागत लोक संगीत विरासत, दालमंडी और चौक की ऐतिहासिक गायकी परंपरा के क्षरण को लेकर बनारस लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में लोक गायिका मालिनी अवस्थी का दर्द मंच से छलक पड़ा। रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल के साथ संवाद के दौरान उन्होंने बनारस की लोक गायिकाओं के संघर्ष, त्याग, सामाजिक उपेक्षा और सम्मान की लड़ाई को बेहद भावुक शब्दों में सामने रखा। मालिनी अवस्थी ने कहा कि काशी की लोक गायिकाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि वे संगीत साधना, त्याग और सामाजिक चेतना की वाहक थीं। लेकिन समय के साथ उनकी इज्जत, पहचान और विरासत को लगातार हाशिए पर धकेला गया।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : महामना और दालमंडी की गायिकाओं का प्रसंग

बीएचयू की स्थापना से जुड़ा ऐतिहासिक प्रसंग साझा करते हुए मालिनी अवस्थी भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि जब महामना मदन मोहन मालवीय दान संग्रह के लिए दशाश्वमेध घाट जा रहे थे, तब दालमंडी की गायिकाएं उनके स्वागत की प्रतीक्षा करती रहीं, लेकिन महामना वहां नहीं पहुंचे। इससे गायिकाओं को अपमान का भाव हुआ, फिर भी उन्होंने अपने स्वर्ण कड़े और आभूषण बीएचयू निर्माण के लिए भिजवा दिए।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : दुलारी बाई का पत्र पढ़ते हुए मालिनी अवस्थी की आंखें नम हो गईं। पत्र में लिखा था कि हम पढ़े-लिखे होते तो दालमंडी का कोठा हमारे नसीब में नहीं होता। आपके इस पुण्य कार्य से बनारस की बेटियां संगीत में नाम करें, इसके लिए हम सब न्योछावर कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यही काशी की लोक गायिकाओं की परंपरा रही है— त्याग और साधना की परंपरा।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : ‘मेरी 40 साल की लड़ाई इज्जत के खिलाफ रही है’

मालिनी अवस्थी ने दो टूक कहा कि “मैं बैठी और खड़ी दोनों महफिलें करती हूं, गाती भी हूं और नाचती भी हूं। मेरी 40 साल की लड़ाई इसी इज्जत के खिलाफ रही है। आज आप बेगम अख्तर को सुनकर वाह-वाह करते हैं, लेकिन उस दौर की गायिकाओं को किस नजर से देखते हैं? उन्होंने सवाल उठाया कि समाज ने गायिकाओं को कला के आधार पर नहीं, बल्कि नैतिकता के दोहरे मानदंडों पर परखा।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : 1952 का कानून और संगीत पर प्रतिबंध

स्वतंत्रता के बाद संगीत पर लगाए गए प्रतिबंधों का जिक्र करते हुए मालिनी अवस्थी ने बताया कि 1952 में संस्कृति मंत्री के कानून के तहत तवायफों के रेडियो पर गाने पर रोक लगा दी गई। इससे सदियों पुरानी समृद्ध संगीत परंपरा लगभग खत्म हो गई। उन्होंने कहा, “जिसे उस दौर में अश्लील कहा गया, वही गीत आज मंचों पर अभिनेत्रियां गा-नाच रही हैं और समाज तालियां बजा रहा है। संगीत को लेकर सोच बड़ी करनी होगी।”

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : गांधी जी और देशभक्ति गीतों का उल्लेख

मालिनी अवस्थी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र, नैना बाई और महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि काशी में कभी बिना अहंकार के कला का सम्मान होता था। उन्होंने बताया कि जब गांधी जी ने गायिकाओं से ‘मन बहलाने’ के बजाय देश के लिए गाने को कहा, तब हुस्नाबाई और विद्याधरी बाई जैसी गायिकाओं ने देशभक्ति गीतों से जवाब दिया।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : ठुमरी पर भावुक टिप्पणी

ठुमरी की आत्मा पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “जिसका दिल नहीं टूटा, जिसने जलालत नहीं सही, वह ठुमरी-दादरा नहीं गा सकता।” उन्होंने अफसोस जताया कि आज लोकगीत गाने वालों को कोई नहीं जानता, जबकि बनारस की ठुमरी को समझने के लिए रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और महादेव मिश्र को सुनना जरूरी है।

Malini Awasthi Banaras Lit Fest 2026 : काशी की असली सांस्कृतिक धरोहर

अपने वक्तव्य के अंत में मालिनी अवस्थी ने काशी बाई, हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई और दुलारी बाई का नाम लेते हुए कहा कि यही बनारस की असली सांस्कृतिक धरोहर हैं। “इन गायिकाओं को समझे बिना काशी की संगीत परंपरा कभी पूरी नहीं हो सकती,” उन्होंने कहा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *