Indian Knowledge Tradition Seminar : महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में भारतीय ज्ञान परंपरा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, 80 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत, पुस्तक विमोचन और देशभर के विद्वानों का मंथन।
Indian Knowledge Tradition Seminar : भारतीय ज्ञान परंपरा को सीमाओं में बांधना असंभव : प्रो. निर्मला मौर्या

Indian Knowledge Tradition Seminar : महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदनमोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग तथा प्रो. वासुदेव सिंह स्मृति न्यास, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय ज्ञान परंपरा का संप्रेषण: सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य’ बुधवार को सफलतापूर्वक संपन्न हुई। डॉ. भगवानदास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित इस संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श हुआ। देश के 22 राज्यों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने चार तकनीकी सत्रों में 80 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए।
Indian Knowledge Tradition Seminar : सहनशीलता भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल तत्व
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप द्विवेदी ने कहा कि “सहनशीलता ही भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है। दया, करुणा और सहिष्णुता सभी धार्मिक ग्रंथों का सार हैं।” उन्होंने कहा कि प्रो. वासुदेव सिंह ने अपने ग्रंथों के माध्यम से उपनिषदों, पुराणों और भारतीय चिंतन परंपरा को संरक्षित किया, जिसे उनका परिवार आज भी संजोए हुए है।

Indian Knowledge Tradition Seminar : ज्ञान स्वयं एक तप है : प्रो. निर्मला मौर्या
मुख्य अतिथि वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. निर्मला मौर्या ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत विशाल, बहुआयामी और समावेशी है। उन्होंने कहा, “भारतीय ज्ञान परंपरा को किसी सीमा में बांधना संभव नहीं है। यह वेदों, उपनिषदों और पुराणों से लेकर आधुनिक युग तक निरंतर प्रवाहित होती रही है। ज्ञान स्वयं में एक तप है।”
Indian Knowledge Tradition Seminar : शब्द को ब्रह्म का स्थान
हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संत साहित्य में शब्द को ब्रह्म का दर्जा प्राप्त है। उन्होंने विद्यार्थियों से शब्द-साधना, अध्ययन और गहन पठन की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया। डॉ. मनोहर लाल ने अपने संबोधन में विद्यार्थियों को पुस्तकों से अध्ययन करने और पढ़ने की परंपरा अपनाने पर जोर दिया।
Indian Knowledge Tradition Seminar : तकनीकी सत्रों में गहन विमर्श
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. जंग बहादुर पांडेय ने कहा कि प्रगति के लिए आचरण और विवेक अत्यंत आवश्यक है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक की प्रो. रेनू सिंह ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि “वसुधैव कुटुम्बकम् भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है।” शशि प्रकाश सिंह (एस.जे.आई., प्रयागराज) ने भारतीय भाषाओं को एक ही परिवार की भाषाएं बताते हुए उनकी व्यापकता पर बल दिया। डॉ. मुंकेश कुमार शुक्ल ने नालंदा विश्वविद्यालय की पांडुलिपियों का उल्लेख करते हुए भारतीय ज्ञान की ऐतिहासिक क्षति और पुनर्प्राप्ति की जानकारी दी।
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के चार तकनीकी सत्रों में देश भर के प्राध्यापकगण एवं शोधार्थियों ने 80 से ज्यादा शोध पत्र प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में भारत के 22 राज्य के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग एवं शोध पत्रों का वाचन किया।

Indian Knowledge Tradition Seminar : पुस्तक विमोचन
इस अवसर पर प्रो. श्रद्धा सिंह एवं डॉ. हिमांशु शेखर सिंह की पुस्तक ‘स्त्री-चेतना एवं भारतीय मुख्य, कुछ राग–कुछ रंग’
का विधिवत विमोचन किया गया।
Indian Knowledge Tradition Seminar : देशभर से सहभागिता
संगोष्ठी में प्रो. सुमन जैन, डॉ. दयानन्द, डॉ. नागेंद्र पाठक, डॉ. शिवजी सिंह, डॉ. आशा यादव, डॉ. धीरेन्द्र राय सहित अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम में इस अवसर पर डॉ. संतोष मिश्र, डॉ. जयप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. सुधांशु शेखर सिंह, डॉ. प्रभा शंकर मिश्र, डॉ. श्रीराम त्रिपाठी, डॉ. वैष्णवी शुक्ला, डॉ. अजय वर्मा, डॉ. चन्द्रशील पाण्डेय, खुश्बू सिंह, गुरू प्रकाश सिंह, गणेश राय, देवेन्द्र गिरि, सपना, डॉली, पुलकित, मनीष, समर, स्तुति, वंशिका, दिशान, जूली, शाजिया, अनुष्का, जाह्नवी, श्रेया, रिद्धि आदि बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी और शिक्षाविद उपस्थित रहे।
स्वागत: डॉ. हिमांशु शेखर सिंह
संचालन: डॉ. राहुल अवस्थी
धन्यवाद ज्ञापन:डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह, निदेशक, महामना मदनमोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान
रिपोर्ट प्रस्तुति: प्रो. श्रद्धा सिंह