Nati Imli Bharat Milap : वाराणसी के विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली भरत मिलाप में 14 वर्ष के वनवास के बाद भगवान श्रीराम और चारों भाइयों का मिलन हुआ। काशी नरेश की शाही सवारी, यादव बंधुओं की पुष्पक विमान परंपरा और 483 वर्ष पुराने इतिहास की जानें पूरी कहानी।
Nati Imli Bharat Milap : नाटी इमली भरत मिलाप- 14 वर्ष के वनवास के बाद चारों भाइयों का हुआ मिलन, सजल हुए लाखों श्रद्धालुओं के नयन
Nati Imli Bharat Milap : वाराणसी। धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी में विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली का भरत मिलाप गुरुवार को पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। काशी के लक्खा मेलों में शुमार इस ऐतिहासिक लीला को देखने के लिए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। जैसे ही शाम 4 बजकर 40 मिनट पर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण अपने अनुज भरत और शत्रुघ्न से मिलने के लिए लीलास्थल की ओर दौड़े, पूरा परिसर जय श्रीराम और राजा रामचंद्र की जय के उद्घोष से गूंज उठा। 14 वर्ष के वनवास के बाद चारों भाइयों के मिलन का भावुक दृश्य देखकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। आस्था, प्रेम, त्याग और भाईचारे का यह अद्भुत संगम काशी की प्राचीन धार्मिक परंपरा का जीवंत उदाहरण बना।
Nati Imli Bharat Milap : शाही सवारी से भरत मिलाप देखने पहुंचे काशी नरेश
नाटी इमली के भरत मिलाप में काशी नरेश की उपस्थिति परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। गुरुवार को महाराज कुंवर अनंत नारायण सिंह अपनी शाही सवारी के साथ लीला स्थल पहुंचे। उन्होंने भगवान श्रीराम सहित अन्य देव स्वरूपों के दर्शन किए और उन्हें सोने की गिन्नियां भेंट स्वरूप प्रदान कीं। इसके बाद काशी नरेश कुछ देर तक लीला देखते रहे और फिर वहां से रवाना हो गए। उनकी उपस्थिति ने आयोजन की ऐतिहासिक और पारंपरिक गरिमा को और बढ़ा दिया।
Nati Imli Bharat Milap : 14 वर्ष का वनवास पूरा कर नाटी इमली पहुंचे प्रभु श्रीराम
चित्रकूट की रामलीला परंपरा के अनुसार आश्विन शुक्ल एकादशी को भरत मिलाप का आयोजन किया जाता है। मान्यता के अनुसार, लंकापति रावण का वध करने और माता सीता को मुक्त कराने के बाद भगवान श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अयोध्या लौटते हैं।
इसी प्रसंग को जीवंत करते हुए गुरुवार को दोपहर बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पुष्पक विमान पर सवार होकर नाटी इमली स्थित भरत मिलाप मैदान पहुंचे। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। जैसे-जैसे मिलन की घड़ी नजदीक आती गई, मैदान में मौजूद लोगों की उत्सुकता बढ़ती गई।
Nati Imli Bharat Milap : भरत के प्रण की रक्षा करने पहुंचे प्रभु श्रीराम
भरत मिलाप की लीला में भाई के प्रति भरत के त्याग, समर्पण और अटूट प्रेम का भाव सबसे अधिक मार्मिक रहा। मान्यता के अनुसार, भगवान हनुमान ने अयोध्या पहुंचकर भरत और शत्रुघ्न को प्रभु श्रीराम के लौटने का संदेश दिया। यह सूचना मिलते ही दोनों भाई बड़े गणेश स्थित रामलीला मैदान से नंगे पांव दौड़ते हुए नाटी इमली के भरत मिलाप मैदान पहुंचे। भरत ने प्रण लिया था कि यदि सूर्यास्त से पहले भगवान श्रीराम नहीं लौटे, तो वह अपने प्राण त्याग देंगे। अपने अनुज के इस संकल्प और प्रेम की मर्यादा रखने के लिए प्रभु श्रीराम सूर्यास्त से पहले उनसे मिलने पहुंच गए।
जैसे ही चारों भाइयों का मिलन हुआ, पूरा वातावरण भावुक हो उठा। भगवान श्रीराम को सामने देखकर भरत और शत्रुघ्न ने साष्टांग प्रणाम किया। इसके बाद चारों भाइयों के गले मिलने का दृश्य देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए। लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़े और पूरा क्षेत्र जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठा।
Nati Imli Bharat Milap : यादव बंधुओं ने कंधे पर उठाया पुष्पक विमान
नाटी इमली के भरत मिलाप में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सदियों पुरानी परंपराओं का भी विशेष महत्व है। लीला के दौरान एक ओर चारों भाइयों के मिलन का प्रसंग चल रहा था, वहीं दूसरी ओर मंच पर मानस मंडल के सदस्य रामचरितमानस की चौपाइयों का पाठ कर रहे थे। आयोजन के दौरान रामदरबार की आरती उतारी गई और श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।
इसके बाद लगभग 483 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए यादव बंधुओं ने पुष्पक विमान को अपने कंधों पर उठाया। इसके साथ ही भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने के प्रसंग को आगे बढ़ाया गया। पुष्पक विमान को कंधों पर उठाने की परंपरा इस आयोजन की विशिष्ट पहचान मानी जाती है और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।
Nati Imli Bharat Milap : मेघा भगत से जुड़ी है भरत मिलाप की ऐतिहासिक मान्यता
नाटी इमली के भरत मिलाप का इतिहास लगभग 483 वर्ष पुराना बताया जाता है। इस आयोजन की शुरुआत को लेकर एक प्रचलित मान्यता संत मेघा भगत से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन मेघा भगत को इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने दर्शन दिए थे।
कहा जाता है कि तुलसीदास के शरीर त्यागने के बाद मेघा भगत विचलित हो गए थे। इसके बाद उन्हें स्वप्न में तुलसीदास से भरत मिलाप की परंपरा शुरू करने की प्रेरणा मिली। तभी से नाटी इमली में हर वर्ष इस ऐतिहासिक लीला का आयोजन किया जाता है। समय के साथ नाटी इमली का भरत मिलाप काशी की सीमाओं से निकलकर देश-विदेश में प्रसिद्ध हो चुका है। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों, भाईचारे और सदियों पुरानी लोक परंपराओं को संरक्षित रखने का भी माध्यम है।
Nati Imli Bharat Milap : आस्था, परंपरा और भाईचारे का प्रतीक है नाटी इमली का भरत मिलाप
नाटी इमली का भरत मिलाप काशी की उन विशिष्ट परंपराओं में शामिल है, जिनमें धर्म और लोकजीवन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। भगवान श्रीराम और उनके भाइयों का मिलन लोगों को प्रेम, त्याग, कर्तव्य और पारिवारिक एकता का संदेश देता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने के लिए जुटते हैं।
इस बार भी चारों भाइयों के मिलन के साथ नाटी इमली का वातावरण भक्तिमय हो उठा। जय श्रीराम के जयघोष, मानस की चौपाइयों और श्रद्धालुओं की आंखों से छलकते आंसुओं के बीच काशी की लगभग पांच शताब्दी पुरानी सांस्कृतिक विरासत एक बार फिर जीवंत हो उठी।