Pandit Deendayal Upadhyaya : महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में पं. दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती पर संगोष्ठी हुई। कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने अंत्योदय और एकात्म मानववाद को विकसित भारत की कुंजी बताया।
Pandit Deendayal Upadhyaya : अंत्योदय का दर्शन स्वर्णिम व विकसित भारत की कुंजी : प्रो. आनन्द कुमार त्यागी
Pandit Deendayal Upadhyaya : महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में पं. दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती पर संगोष्ठी, वक्ताओं ने एकात्म मानववाद और अंत्योदय के महत्व पर रखे विचार
Pandit Deendayal Upadhyaya : वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में पं. दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर शुक्रवार को ‘पं. दीनदयाल उपाध्याय एवं विकसित भारत की संकल्पना’ विषय पर विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ के तत्वावधान में हुआ। संगोष्ठी में वक्ताओं ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद, अंत्योदय, स्वदेशी अर्थचिंतन और भारतीय जीवन मूल्यों को विकसित भारत की संकल्पना से जोड़ते हुए विस्तार से चर्चा की।
Pandit Deendayal Upadhyaya : विकसित भारत के लिए अंत्योदय को अपनाना जरूरी : प्रो. त्यागी
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय का जीवन दर्शन केवल राजनीतिक या सामाजिक विचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के कल्याण और राष्ट्र निर्माण की दिशा दिखाने वाला दर्शन है। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय और एकात्म मानववाद के सिद्धांतों को शैक्षणिक व्यवस्था, शोध कार्यों और दैनिक आचरण में आत्मसात करना होगा। समाज के अंतिम व्यक्ति के सशक्तिकरण को विकास की प्रक्रिया का केंद्र बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति मजबूत और सशक्त नहीं होगा, तब तक आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत की संकल्पना पूर्ण नहीं हो सकती।
Pandit Deendayal Upadhyaya : पश्चिमी विचारधाराओं की सीमाओं से आगे एकात्म मानववाद
मुख्य वक्ता विश्वविद्यालय के अभियंत्रण विभाग के निदेशक प्रो. राकेश कुमार तिवारी ने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन पश्चिमी पूंजीवाद और साम्यवाद की सीमाओं से आगे बढ़कर संतुलित जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना ही वास्तविक प्रगति का प्रतीक है। प्रो. तिवारी ने कहा कि अंत्योदय के मूलमंत्र को आधार बनाकर भारत विकास के नए आयाम स्थापित कर सकता है। उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को वर्तमान सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में प्रासंगिक बताया।
Pandit Deendayal Upadhyaya : युवाओं को पं. दीनदयाल के जीवन से प्रेरणा लेने की सलाह
कुलानुशासक डॉ. अंबरीष राय ने युवाओं से पं. दीनदयाल उपाध्याय के त्याग, सादगी, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की प्रगति वहां की युवा शक्ति के नैतिक चरित्र पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि यदि युवा पीढ़ी भारतीय मूल्यों और अनुशासित जीवनशैली को अपनाती है तो विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
Pandit Deendayal Upadhyaya : सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदनाएं भी विकास का आधार
समाज कार्य विभाग की कार्यवाहक विभागाध्यक्ष प्रो. भावना वर्मा ने कहा कि विकास का अर्थ केवल ऊंची इमारतों का निर्माण या जीडीपी के आंकड़ों में वृद्धि नहीं है। वास्तविक विकास सामाजिक समरसता, समावेशी विकास और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग को विकास की प्रक्रिया से जोड़ना और कमजोर एवं वंचित वर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना विकास की सार्थकता को सुनिश्चित करता है।
Pandit Deendayal Upadhyaya : भारतीय ज्ञान परंपरा और स्वदेशी अर्थचिंतन पर जोर
डीन एकेडमिक्स प्रो. बंशीधर पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी शोध नीतियों में भारतीय ज्ञान परंपरा और पं. दीनदयाल उपाध्याय के स्वदेशी अर्थचिंतन को उचित स्थान दें। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी भारतीय मूल्य आधारित सोच को बढ़ावा देती है। दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष प्रो. नंदिनी सिंह ने एकात्म मानववाद के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह दर्शन व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि के बीच संतुलन स्थापित करने की अवधारणा प्रस्तुत करता है। पर्यावरण संकट और सामाजिक विषमता के दौर में पं. दीनदयाल उपाध्याय का दर्शन महत्वपूर्ण दिशा प्रदान कर सकता है।
Pandit Deendayal Upadhyaya : इनकी रही प्रमुख भूमिका
कार्यक्रम में शोधपीठ के निदेशक प्रो. कृष्ण कुमार सिंह ने विषय प्रवर्तन किया। संचालन उप निदेशक डॉ. ऊर्जस्विता सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन उप निदेशक प्रो. शेफाली वर्मा ठकराल ने किया।
संगोष्ठी में डॉ. नीरज धनखड़, प्रो. आनंद शंकर चौधरी, प्रो. चंद्रशेखर सिंह, डॉ. अभिषेक मिश्रा, डॉ. सतीश कुशवाहा, डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. अश्वनी सिंह, डॉ. किरण सिंह, डॉ. आरती विश्वकर्मा, डॉ. ज्योति त्रिपाठी, डॉ. कविता आर्या, डॉ. आलोक शुक्ला, डॉ. मनोज कुमार सिंह, राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. एस.के. सिंह, डीवी फाउंडेशन के वीरभद्र अनूप, संजय सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।