BHU Dental Research: बीएचयू के वैज्ञानिकों ने बैक्टीरियोफेज तकनीक विकसित की है, जो दांतों की कैविटी और रूट कैनाल के बाद होने वाले संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया को खत्म करने में कारगर साबित हुई है। जानिए इस नई रिसर्च की पूरी जानकारी।
BHU Dental Research: BHU के वैज्ञानिकों का कमाल: प्राकृतिक वायरस से खत्म होगी दांतों की कैविटी, रूट कैनाल संक्रमण पर भी मिली बड़ी सफलता
BHU Dental Research: वाराणसी। दांतों की कैविटी, प्लाक और रूट कैनाल उपचार के बाद दोबारा होने वाले संक्रमण से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) और एससीबी डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कटक के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है, जिसमें बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) यानी प्राकृतिक वायरस की मदद से केवल नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया को नष्ट किया जा सकता है।
BHU Dental Research: यह तकनीक मौजूदा एंटीबायोटिक और रासायनिक माउथवॉश की तुलना में अधिक प्रभावी मानी जा रही है, क्योंकि यह मुंह के लाभकारी बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाए बिना केवल संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया पर हमला करती है। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है और इसे इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एंड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।
BHU Dental Research: क्या हैं बैक्टीरियोफेज और क्यों हैं खास?
बैक्टीरियोफेज ऐसे प्राकृतिक वायरस हैं, जो केवल बैक्टीरिया को संक्रमित करके उन्हें नष्ट करते हैं। इनका इंसानी कोशिकाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान में कैविटी और मसूड़ों के संक्रमण के इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवाओं या क्लोरहेक्सिडिन युक्त माउथवॉश का इस्तेमाल किया जाता है। ये दवाएं हानिकारक बैक्टीरिया के साथ-साथ मुंह के प्राकृतिक माइक्रोबायोम में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया को भी खत्म कर देती हैं।
BHU Dental Research: नई तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बैक्टीरियोफेज केवल लक्ष्य बैक्टीरिया की पहचान कर उसे नष्ट करते हैं, जिससे मुंह का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है।
BHU Dental Research: 24 और 72 घंटे के परीक्षण में मिले शानदार परिणाम
शोधकर्ताओं ने बच्चों की लार और दांतों पर जमी प्लाक से बैक्टीरियोफेज को अलग किया। इसके बाद प्रयोगशाला में 24 घंटे और 72 घंटे तक इनका परीक्षण किया गया।
BHU Dental Research: परीक्षण में पाया गया कि कैविटी के प्रमुख कारण
स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटंस (Streptococcus mutans) द्वारा बनाई गई बैक्टीरिया की परत पर बैक्टीरियोफेज ने बेहद प्रभावी तरीके से हमला किया। परिणामों में यह तकनीक लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे क्लोरहेक्सिडिन से भी अधिक तेज और प्रभावी साबित हुई। रूट कैनाल उपचार के बाद संक्रमण पर भी बड़ी उपलब्धि शोध केवल कैविटी तक सीमित नहीं रहा। वैज्ञानिकों ने रूट कैनाल उपचार के बाद होने वाले दोबारा संक्रमण पर भी महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।
BHU Dental Research: अध्ययन में पाया गया कि एंटरोकोकस फीकेलिस
(Enterococcus faecalis) नामक बैक्टीरिया दांत की जड़ों में मजबूत परत बना लेता है, जिसके कारण कई मरीजों में दोबारा दर्द और संक्रमण की समस्या उत्पन्न होती है। इंसानी दांतों पर किए गए परीक्षण में सामान्य स्थिति में बैक्टीरिया की संख्या 1.35 लाख CFU प्रति मिली दर्ज की गई। बैक्टीरियोफेज की पहली खुराक देने के बाद यह संख्या घटकर केवल 1,528 CFU प्रति मिली रह गई। दूसरी खुराक के बाद बैक्टीरिया पूरी तरह समाप्त हो गए।
BHU Dental Research: दांतों के ऊतकों को नहीं हुआ कोई नुकसान
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दांतों के किसी भी ऊतक या संरचना को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इससे यह तकनीक भविष्य में सुरक्षित और दीर्घकालिक उपचार का मजबूत विकल्प बन सकती है।
BHU Dental Research: भविष्य में आएंगे नए टूथपेस्ट और माउथवॉश
आईएमएस के पूर्व डीन (रिसर्च) प्रो. गोपाल नाथ ने बताया कि इस शोध के आधार पर भविष्य में ऐसे टूथपेस्ट, जेल और माउथवॉश विकसित किए जा सकते हैं, जो केवल हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करेंगे और मुंह के प्राकृतिक माइक्रोबायोम को सुरक्षित रखेंगे। इससे कैविटी, प्लाक और रूट कैनाल के बाद होने वाले संक्रमण की रोकथाम पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो सकेगी।
BHU Dental Research: शोध दल में शामिल रहे ये वैज्ञानिक
इस महत्वपूर्ण शोध में डॉ. अलका शुक्ला, डॉ. मीनाक्षी साहू, डॉ. मीनाक्षी चंदेल, डॉ. गौरव शर्मा तथा आईएमएस, बीएचयू के पूर्व डीन (रिसर्च) प्रो. गोपाल नाथ की अहम भूमिका रही। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एंड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।
BHU Dental Research: क्या बदल सकती है दंत चिकित्सा की तस्वीर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में यह तकनीक बड़े स्तर पर क्लिनिकल परीक्षणों में भी सफल रहती है और व्यावसायिक उत्पादों के रूप में विकसित होती है, तो दांतों की कैविटी, प्लाक और रूट कैनाल संक्रमण के इलाज में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे एंटीबायोटिक पर निर्भरता कम होगी, संक्रमण का खतरा घटेगा और मरीजों को अधिक सुरक्षित तथा प्रभावी उपचार मिल सकेगा।